Saturday, 28 January 2012

$$ हाल-ए-दिल $$

 $$ हाल-ए-दिल $$

कुछ इस तरह मेरा अक्स नज़र में छुपा लेना....
शेर जुबां पे रखना, गज़ल दिल में बसा लेना....
वक्त-ए-सफर में तुमको अकेले ही चलना है गर....
मेरी यादों का महल दिल के कोने में सजा लेना....
कोशिश कभी करना नहीं दिल तोडने कि फिर....
मुझे याद करना पहले फिर किसी को सजा देना....
यूँ तो हज़ार बातें तुम्हे कहनी थी मुझसे....
रोज आना मेरी लहद पे जो चाहे सुना लेना....
अगर एक फूल का हकदार भी नहीं है दीवाना....
मज़ार-ए-राज पर कांटो का गुलदस्ता चढा देना....

$$ पता नहीं क्यों? $$

$$ पता नहीं क्यों? $$

फिर से वादे निभाना है, पता नहीं क्यों?
फिर से मुस्कुराना है, पता नहीं क्यों?

उसने बस थोड़े दिनों कि मोहलत अता कि है....
फिर से ख्वाब सजाना है, पता नहीं क्यों?

उनसे कभी पूछूं कि आखिर माज़रा क्या है....
वो कहते है नहीं बताना, पता नहीं क्यों?

वो तो खुश है किसी गैर के दामन से लिपटकर....
मुझे भी कफ़न सजाना है, पता नहीं क्यों?

कोई हसरत कोई उम्मीद भी नहीं रही अब राज....
मिलने मगर जाना है, पता नहीं क्यों?

$$ Musafir hun safar karta hun $$

$$ Musafir hun safar karta hun $$

बे-इत्तिफाकी से गुज़र चलता है,
दिलों के फासलो से डरता हूँ.....
 
फाखिर बनकर कौन जी सका है....
सुलह कि पहल सदा करता हूँ....
 
कुछ कायम है अभी ज़ाबिता....
संभल संभलकर चलता हूँ....
 
जिंदगी गुम्गस्ता ना हो जाये....
नसीहतों पे अमल करता हूँ....
 
तारीख मुक़र्रर सभी कि है राज....
मुसाफिर हूँ सफर करता हूँ....

कुछ शेर.......

कुछ शेर.......

मतलब परास्त हो चुकी है सारी दुनिया....
आजकल लोगो का इत्तिहाद कुछ नहीं रहता....

जिसका हो होसला बुलंदियों पे जाने का....
उसके लिए कभी उफ्ताद कुछ नहीं रहता....

एक शरीफ-ए-दिल कभी जब गुस्से में आता है....
उसकी निगाहों में फिर जल्लाद कुछ नहीं रहता....

अभी बसंत है पतझड़ भी ज़रूर आएगी....
दस्तूर-ए-दुनिया है आबाद कुछ नहीं रहता....

Friday, 27 January 2012

$$ मर्ज़-ए-इश्क $$

$$ मर्ज़-ए-इश्क $$

दीवानगी भी अजीब रोग लगने लगा है....
बेवजह कोई रातो को जगने लगा है....

एक दिन वही मुझे रुला के जाएगा....
जो होंठो कि मुस्कराहट लगने लगा है....

वही कहेगा मुझे एक दिन लापरवाह....
जिसका ख्याल हर वक्त रहने लगा है....

उसी के दिल कि नफरत मैं बन जाऊंगा....
जो मोहब्बत बनके दिल में रहने लगा है....

ता-उम्र जिसने किसी कि बातें न सुनी....
सभी के ताने हंसके सुनने लगा है....

इन इश्क के मरीजों को समझाना गुनाह है राज....
जिनका सारा वक्त नासमझी में काटने लगा है....

$$ इल्तेज़ा-ए-रहम $$

$$ इल्तेज़ा-ए-रहम $$

Meri aankho se khwab na cheena karo....
Gulshan se yun gulaab na cheena karo....

Chupa rahne do dard se bhara hua aks....
Mere chehare se nakaab na cheena karo....

Yahi rakhti hai gham se mehroom mujhe....
Mere hatho se sharab na cheena karo....

Husn-e-jamaal zara parde me nikla karo....
zamane bhar ka iztiraab na cheena karo....

Mujhe bhi shikayate kar lene diya karo Raj.....
Muskurakar mera itaab na cheena karo....

$$ आज़ाब-ए-मोहब्बत $$

$$ आज़ाब-ए-मोहब्बत $$

यादो के कारवां बढते चले गए,
हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते चले गए....

बदलती रही तस्वीर मेरी तकदीर कि मगर...
हाथो कि लकीरों से हम लड़ते चले गए....

तेरे इंतज़ार में रोने के सिवा बाकि क्या रहा....
निगाहों के हंसी गुलशन उजड़ते चले गए....

तेरे ख्वाबो में जब तसब्बुर किसी और का देखा....
हम अपनी ही आरजू में सिकुड़ते चले गए....

मोहब्बत ना जाने क्या गुनाह है राज....
आज़ाब पे आज़ाब उमड़ते चले गए....